चलो तो सही

“चलो तो सही” – RhYmOpeDia

चलो तुम्हारी आँखों में अपना शहर बसाते हैं,
चलो तुम्हारी हसीं से अपना जहाँ रोशन करते हैं,
चलो तुम्हारी आवाज़ को अपना संगीत बनाते हैं,
चलो तुम्हारी चाल को अपनी चाल बनाते हैं,
चलो तुम्हारे हाथों को थाम कर दूर तक का सफर करते हैं,
चलो तुम्हारे बातों के साथ सुबह-शाम करते हैं,
चलो तुम्हारे खामोशियों से बात करते हैं,
चलो तुम्हारे मासूमियत से इश्क फरमाते हैं,
चलो तुम्हारे खुशबू को इत्र बना इस्तेमाल करते हैं
चलो तुम्हारे झलक के साथ रोज़ा खत्म करते हैं,
चलो तुम्हारे साथ होली-‌ दीवाली मनाते हैं,
चलो तुम्हें अपनी ज़िन्दगी बनाते हैं,
चलो तो सही तुम्हारे साथ जिंदगी बिताते हैं।

तुम दूर तक साथ तो चलोगी ना?
मुझे गिरते हुए सम्हाल तो लोगी ना?
मेरा साथ तो दोगी ना?
मेरे गलतियों को थोड़ा माफ़ तो कर दोगी ना?
तुम खुद से रूबरू होने दोगी ना?
मुझे अपना जिंदगी तो बनाओगी ना?
तो फिर चलो हम साथ जिंदगी बिताते है।


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तुम पुछते हो

“तुम पुछते हो” – RhYmOpeDia

तुम पुछते हो, मुझे उसमें क्या पसंद है?
उसकी बातें पसंद हैं
उसकी शरारतें पसंद हैं
उसकी हल्की भूरी आँखें
उसके होंठों के निचे तिल
और उसकी मुस्कान पसंद है।
उसकी दोस्ती पसंद है
उसकी आवाज पसंद है
उसकी रंगीन शख़्सियत
उसकी हर एक छोटी से छोटी अदाएं
उसका कातिलाना अंदाज पसंद है।
और तुम पुछते हो, मुझे उसमें क्या पसंद है।

तुम पुछते हो, मुझे उससे क्यों प्यार है?
तो मेरी मोहब्बत का राज़ तुम
उन हवाओं से पूछो जो आज उसे छूने के बाद बावरी हो गई,
उन वादियों की खुबसूरती से पूछो जो उसके सामने पल भर टीक न पाई,
उन बारिश के बूंदों से पूछो जो उससे रूबरू होने इतनी दूरी तय कर धरती पर आई,
उन फूलों से पूछो जो उससे मिलने से पहले अपने खुशबू पर इतराया करती थी,
उन पक्षियों से पूछो जो कभी अपने मधुर आवाज को लेकर जानी जाती थी,
और तुम पुछते हो, मुझे उससे प्यार क्यों है।

तुम पुछते हो, मुझे वो इतनी खास क्यों है?
तो क्या कभी आसमान से पूछा है कि वह नीला क्यों है?
क्या कभी सुरज से पूछा है कि वह इतना ज्वलनशील क्यों है?
क्या कभी चांद से पूछा है कि वह खुबसूरत क्यों है?
क्या कभी धरती से पूछा है कि वह गोल क्यों है?
क्या कभी खुशबू से पूछा है कि वह खुशनुमा क्यों है?
क्या कभी दिन से पूछा है कि वह रात के बाद क्यों है?
क्या कभी कश्मीर से पूछा है कि वह स्वर्ग क्यों है?
और तुम पुछते हो, मुझे वो इतनी खास क्यों है।

तुम पुछते हो, मुझे वह कैसी पसंद है?
हंसते- खिलखिलाते पसंद है
मंद-मंद मुस्कुराते पसंद है
कभी-कभार गुस्साते पसंद है
जल्दी-जल्दी बोलते पसंद है
आदाब में हिचक पसंद है
चेहरे पर हया पसंद है
नखरो के संग अभियान करते पसंद है
आंखों से बात जाहिर करते पसंद है
वह जैसी है वैसी ही पसंद है
वह मुझको काले कमीज़ में बेहद पसंद है
और तुम पुछते हो, मुझे वह कैसी पसंद है।


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मालूम नहीं

यह जो लड़ाई थी,
जिसमें शामिल न तुम थे,
न हम थे,
फिर भी न जाने क्यों ये गरदीस थी?
ये मौसम कि रूहानियत थी,
वो हवा कि सर- सराती हुई बेरूखी थी,
और सांसों की गिनती भी कम थी,
और ऐसे में भी,
तुम्हारा न आना तय था।

मैं आज कि नहीं, उन लम्हों कि बात कर रहा हूं,
जब तुमने, छुआ था मेरे दिल के इस तार को,
और बड़ी मासूमियत से, तोड़ा था उस दिल के हाल को,
सच कहता हूं , वो जो वक्त ठहरा था मेरे आस-पास,
उसकी याद, आज भी आंखें नम कर जाती है,
शायद,
वह समर जो दुनिया वाले भूल चुके हैं,
वो दंगे, वो लड़ाई, आज भी होती है,
मेरे दिल के इस दरवाजे पे।

कितना समझाया इसे, पर यह मानता भी तो नहीं है,
तैयार है ये,
उन धूल खाते दर्द को फिर से तरोताजा करने को,
जो अपनी निशाना छोड़ गई थी बरसों पहले,
मालूम नहीं,
ये उस दर्द को इक बार फिर से झेल पाएगा कि नहीं,
मालूम नहीं,
ये उस जुदाई को फिर से सह पाएगा कि नहीं,
मालूम नहीं,
ये उन आंखों से गिरते हुए आंसू को फिर से रोक पाएगा कि नहीं,
मालूम नही,
ये सांसों की गिरती हुई रफ्तार को फिर से जोड़ पाएगा कि नहीं,
मालूम नहीं………… मालूम नहीं
पर तैयार है यह,
आज एकबार फिर से ऐतवार के लिए।


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तुम हो कौन ?

अगर इश्क़ कोई जुर्म नहीं, फिर ये सजा क्यों।
और है नफरत, तो भारत-पाकिस्तान सा रिश्ता क्यों ।।

अगर दर्द कोई है तेरे दिल में, फिर ये बात क्यों।
और है सुकुन, तो ये अस्पताल क्यों।।

अगर रंज कोई है तेरे सोच में, फिर ये तंज क्यों।
और है गीत , तो ये तीर क्यों।।

अगर हो कोई फूल तुम, फिर इतनी दूर्गन्ध क्यों।
और हो कांटा, तो लैला- मजनू सा इश्क क्यों।।

अगर टूटती – बिखरती सी कोई ख्वाब हो तुम, फिर ये अपनापन वाला राबता क्यों।
और हो हकीकत , तो मैं तनहा क्यों।।

अगर अजनबी सी कोई हो तुम, फिर तुम्हें खोने का डर क्यों।
और हो मेरी, तो ये सौतेलापन क्यों। ।

अगर गुनाह सी कोई हो तुम, फिर तुम्हारे पास होने पे इतना सुकुन क्यों।
और हो इबादत, तो ये घबराहट क्यों।।

अगर परेशानी हो कोई तुम, फिर तुम्हारा इतने बेसब्री से इंतजार क्यों।
और हो मददगार , तो बात- बात पर ये पत्थर क्यों।।

अगर झूठ सी कोई हो तुम , फिर सीने में तुम्हारे होने का एहसास क्यों।
और सच हो, तो तुम हो कौन ?

Continue reading तुम हो कौन ?

तेरे चेहरे की तारीफ़ है!

तेरे चेहरे की क्या तारीफ़ है हर चीज़ इसकी बड़ी बारीक है,
होठों पर बिखरी ये मुस्कान है करतीं ये लाखों का नुकसान है,
नाक के ऊपर कजरारी आँखें है जो सबको उलझाती हैं।

पर जनाब,
ये चेहरा तो सिर्फ नकाब है ये तो मासूमो को फ़साने का जाल है,
कई लोगों को इस चेहरे के न मिलने का मलाल है,
हर कोई इस चेहरे का दीवाना है सभी को इस चेहरे को पाना है।

इस नकाब जैसे चेहरे में बड़ी जादूगरी है धोकेबाज़ी इसमें भरी पड़ी है,
जनाब बच के रहना इस धोकेबाज़ चेहरे से इसमें मासूमियत बड़ी है ,
फिर भी, तेरे चेहरे की क्या तारीफ़ है हर चीज़ इसकी बड़ी बारीक है !!


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क्या मुझसे मिलने आयी हो?

क्या मुझसे मिलने आयी हो? कह दो ना तुम,
एक बार के लिए ही सही,
बस कह दो कि तुम मुझसे मिलने आयी हो,
सच कहता हूं,
कोई और कारण रोक नहीं पाएगा मुझे,
तुमसे मिलने से,
बस तुम एक बार कह दो कि तुम मुझसे मिलने आयी हो।

सच कहता हूं,
अब मुझे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम अकेले आयी हो,
या फिर किसी के साथ आयी हो,
बस कह दो कि मुझसे मिलने आयी हो।

शायद तुम्हें याद नहीं, पर उस दिन कि बातें जो अधूरी रह गई थी हमारे बीच वो अब भी बाकी है,
वो तुम्हारी रखी आधी चाय, उस दिन जो फ़ोन के चक्कर में तुमने छोड़ दी थी वो अब भी बाकी है,
वो तुम्हारा लुडो खेलना मेरे साथ और जीत जाने पर बरी मासुमियत से चिढ़ाना मुझे अब भी बाकी है,
वो मेरे साथ लड़ाई, वो खट्टी-मीठी नोक-झोंक ही सही पर वो सब अब भी बाकी है,
शायद तुम्हें याद नहीं पर वह तुम्हारी टूटी चप्पल सिलने के बाद अभी भी तुम्हारी राह देख रही है,
वो मेरी डायरी पे तुमने जो अधूरी चित्रकारी की थी वो भी पूरा होने के लिए तुम्हारे हाथों से बैचैन हो रही है,
वो उस दिन तुम्हारे साथ जब घूम रहा था तब तुम्हारा हाथ अपने हाथों में डालकर घूमना बाकी रह गया था वो अब भी बाकी है,
तुम्हे याद है कि नहीं पर तुम्हारे साथ मेरी कुछ बातें , कुछ सपने अधूरे रह गए वो अब भी बाकी है।

आज आई हो तो बस कह दो कि तुम वो बातें पूरी करने आयी हो जो कभी हमारे दरम्यान अधूरी रह गई थी,
या फिर वो अधूरी चाय के साथ बची सिसकियां पूरी करने आयी हो जो तुमने कभी अधूरा छोड़ा था,
बस एक बार कह दो कि तुम वो अधूरा लूडो का खेल जो पहले कभी हमने साथ खेला था उसे खत्म करने आयी हो,
या वो डायरी पे बनी अधूरी चित्रकारी जो तुम्हारा राह देख रही है उसे पूरा करने आयी हो,
नहीं तो मेरे साथ हाथों में हाथ डालकर एक हो के घूमने आई हो,
बस एक बार कह दो कि तुम मुझसे मिलने आयी हो,
झूठ ही सही बस एक बार कह दो कि तुम मुझसे मिलने आयी हो।


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ऐहसास

मैं लिखता हूँ,
कागज और कलम से प्यार करता हूँ,
भूख – प्यास के साथ तकरार करता हूँ,
हर पल तेरी मौजूदगी का एहसास करता हूँ,
बेरूखी हवाओं में भी तेरी रूह से ऐतवार करता हूँ,
बेमौसम की तनहाई में खुद से बात करता हूँ,
रात – दिन तेरी यादों के साथ फरियाद करता हूँ,
कयामत से पहले तेरे आने का बेसब्री से इंतजार करता हूँ,
इसलिए मुझे अकेला और निकमा मत समझना,
क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।

लिखती हूँ मैं,
तेरे इजहार का इंतजार करती हूँ,
क्यूं जाने तुझमें हर रोज अपनी तलाश करती हूँ,
मिलने का तुमसे दिन – रात आस रखती हूँ,
तस्वीर तेरी अपने पास रखती हूँ,
एक मुस्कान के लिए तेरी में इतनी बार हार सकती हूँ,
तेरी हर बुरी आदत से लगाव रखती हूँ,
इसलिए मुझे अकेली और निक्कमी मत समझना,
क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ।


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पर अब, तुमसे प्यार नहीं है

नींद तो अब भी नहीं आती,
भुख तो अब भी नहीं लगती,
दिल और दिमाग की लड़ाई तो अब भी होती है,
पर अब, तुमसे प्यार नहीं है।

तेरे नाम पे आज भी चुप हो जाता हूँ,
आज भी बोलते- बोलते लड़खड़ा जाता हूँ,
कभी- कभी ही सही, पर तुम्हें याद तो आज भी कर लेता हूँ,
पर आज, तुमसे प्यार नहीं है।

आज भी तेरी गलियों से, हूँ मैं गुजरता,
डर आज भी, मुझे है उतना ही लगता,
मुस्कुरा लेता हूं आज भी, तेरी हरकतें याद करके,
पर कसम से, अब तुमसे प्यार नहीं है।

लिखता तो तुम्हें आज भी हूँ,
तेरा जिक्र मेरे सामने आज भी होता है,
तेरे नाम से, आज भी लाली छा जाती है चेहरे पे,
पर कतई , आज तुमसे प्यार नहीं है।

आज भी आईने के सामने सजता हूँ,
हवाओं के अलग होने का आज भी एहसास करता हूँ,
इश्क में आज भी निलाम होता हूँ,
वो भी सरे आम होता हूँ,
पर सच मे, आज तुमसे प्यार नहीं है।

तेरे नाम से मुझे चिढ़ाती आज भी तेरी सहेलियाँ है,
आज भी मेरा सिगरेट और शराब से बैर ही है,
मेरा इश्क आज भी मुफ्त का बाजार ही है,
पर दिल से, अब तुमसे, प्यार नहीं है।


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Ishq Ki Beemari

Wo aayi to thi kajal laga ke,
Lekin chli gyi mere dil ko nazar laga ke.
Mil aaya kayi hakim aur pandito se,
Laut aaya doctoro ki dehleej se,
Le li salah kayi sahalakaro se,
Maang li manat raam aur rahim se,
Par ye mun dhoondhta hai abb bhi use hi andhere rasto pe,
Jis ne parchai bankar chlne ka vaada kiya tha.

Naa raat ko nind aati hai,
Naa shaam ko chain milta hai,
Din buss umeedo mai dhal jaata hai,
Phir se to kahi milegi wo nazrili aakhe,
Jo aayi thi kaajal laga ke.


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लेकिन अब भी बाकी है

लिखा है अकेले अबतक , अब तुम्हारे साथ लिखना बाकी है।
लिखे है मैंने पन्ने कई, लेकिन तुम्हारे बारे में लिखना बाकी है।
लिखा है तुम्हारी आँखों के बारे में, लेकिन उसकी नशीली अदाओं के बारे में लिखना बाकी है।
लिखा है तुम्हारे होंठो के बारे में, लेकिन उसकी मदहोशी के बारे में लिखना बाकी है।
लिखा करता हूं तुम्हारी बातो के बारे में, लेकिन तुम्हारे बारे में तो लिखना बाकी है।
लिखे है तुम्हारी खुबसूरती पर, लेकिन उसे खुबसूरती के साथ लिखना बाकी है।
लिखे होंगे तुम पर किस्से कई, लेकिन तुम्हारे बारे मे किस्से लिखना अब भी बाकी है।
तुम्हारे लिए कई मन्नतें मांगी, लेकिन तुम्हें किसी मन्नत मे मांगना अब भी बाकी हैं।
किताबें कई सारी पढी है मेने, लेकिन तुम्हारे चेहरे को पढ़ना अब भी बाकी है।
तुम्हारे लिए बहुत कविताऐं लिखी, लेकिन तुम पर कविता लिखना अब भी बाकी है।।


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