एकतर्फा प्यार

एकतर्फा प्यार…
अगर सच कहाँ जाये तो उस मुकम्मल प्यार से खूबसूरत और बेहतर होता है यह एकतर्फा प्यार!
एक साफदिल भाव,
वो मुझे चाहे ना चाहे, मै उसे चाहना कभी नही छोडुंगा, ना उससे कभी किसी अपनेपन कि आशा रखुंगा,
बस उसकी खुशी मे ही मेरी खुशी!

दो तर्फे प्यार मे अक्सर हम स्वार्थी बन जाते है,
आशाये रखना शुरु कर देते है और फिर होता है अपेक्षाभंग, दिल टुटना, दर्द, और बहुत सारा मेलोड्रामा!

दुसरी ओर एकतर्फा प्यार बहुत ही पाक, सच्ची, निस्वार्थ भावना है,
पर पता नही फिर भी क्यूं लोग एकतर्फा प्यार से इतना नफरत करते है?

एकतर्फा प्यार…

हमारे इस प्यार को किसी के स्विकृती कि जरुरत नही होती है,
किसी से प्यार करने के लिये किसी के इजाजत कि भी जरुरत नही होती है,
हमारी वजह से उस दिल रूवा के चेहरे पर हसी भी आजाये, तो खुश होते हैं हम!
कभी किसी मुसीबत के वक्त अगर हम उसके काम आ जाए, तो खुश होते हैं हम!
इस प्यार मे भले ही तन्हा होते हैं हम, भले ही वह बदले में नही चाहती हो हमे,
पर उसके सिर्फ आसपास होने से खुश होते हैं हम!
हा! खुश होते हैं हम,
क्यूंकि किसी ओर को हक नही है अब हमारा दिल तोडने का!!!
हा! खुश होते हैं हम,
क्युंकि किसी को हक नही है हमें उसे चाहने से रोकने का…! ❤


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imkeshavsawarn |

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सर्कस निर्णय का

जीवन की डोर दूसरो को थामने का अवसर न दें।
अपने जीवन को अपने तरीके से अौर अपने लिए जिये ना कि दूसरो के लिए।

सर्कस और नेशनल पार्क में क्‍या अंतर है! जो दोनों जगह गए हैं, वही असली बात बयां कर सकते हैं। जो नहीं गए, वह दूसरों के अनुभव के आधार पर कहानी कह सकते हैं, लेकिन वन्‍यप्राणियों की मानसिकता, आजादी, व्‍यवहार के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है।

सर्कस में जानवर प्रशिक्षित हैं। उन्‍हें काम के बदले भोजन मिलता है। इस तरह उनका ‘करियर’ सुरक्षित है।

वहा उन्हें शिकारी से भय नहीं, खतरनाक मनुष्‍यों और जानवरों का डर नहीं। दूसरीे अौर नेशनल पार्क के वन्‍यप्राणी हैं। खतरा, चुनौती हर कदम पर। भोजन के लिए खुद ही जतन करने हैं। इसके बाद भी क्‍या कोई वन्‍यप्राणी इच्‍छा से सर्कस चुनेगा? विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इस बारे में शायद ही असहमति हो कि जीवन का सुख कहां अधिक सुरक्षित है।

जाने-अनजाने हम नेशनल पार्क की आजादी की जगह ‘सर्कस’ वाला जीवन जी रहे हैं। दूसरों के वादे, रहम पर जिंदगी में शांति, सुकून तलाश रहे हैं।

मेरे दोस्त पतंग का मालिक डोर खरीदने वाला नहीं, उड़ाने वाला होता है। इसलिए अपने जीवन की डोर दूसरे को थामने का अवसर न दें। अपनी सोच-समझ से खुद फैसले लीजिए। वह गलत हो सकते हैं, तो होने दीजिए, क्‍योंकि अंत उन्‍हें अपना कहने का सुख तो होगा!

निर्णय लेने की क्षमता दूसरे के पास गिरवी मत रखिए। जीवन की सबसे खूबसूरत चीज का मोल जब तक आप नहीं समझेंगे, हीरे भी चांदी के भाव दूसरों को थमाते रहेगे।

सोचन-समझने की शक्ति, निर्णय लेने की क्षमता प्रकृति का मनुष्‍य को सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन यांत्रिक, संवेदनशून्‍य शिक्षा और यथास्थितिवादी समझ ने हमें वैज्ञानिक नजरिए से वंचित कर दिया है।

निर्णय लेने का अधिकार मनुष्‍य होने का सबसे खूबसूरत अहसास है। हम क्‍या हो सकते हैं, इसकी पहली सीढ़ी तो हमारा निर्णय है। लेकिन अक्‍सर हम खास अवसर पर निर्णय लेने से हिचकते ही नहीं, बल्कि भागते रहते हैं।

मिसाल के लिए भारत में बच्‍चे क्‍या पढ़ें, कहां पढ़ें जैसे निर्णय खुद नहीं लेते। शादी, बच्‍चे की परवरिश और करियर जैसे निर्णय के लिए हम दूसरों को फॉलो करते हैं। जिंदगी के सबसे अहम पड़ाव के लिए हमेशा दूसरों की ओर देखते रहते हैं । यह तीन चीजें हमारी सोच, समझ और निर्णय लेने की क्षमता का सबसे सरल, सामान्‍य उदाहरण है।

हममें से कितने लोग हैं, जो इन तीनों के दौरान वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हैं! भारत में शादियों के दौरान वर पक्ष का व्‍यवहार अभी भी शालीन, सभ्‍य कहे जाना तो दूर, सामान्‍य के निकट भी नहीं है। क्‍योंकि हमने लड़़के और लड़‍की के बीच अंतर को मन से दूर नहीं किया है। ऐसा भी नहीं कि हम इस दिशा में आगे नहीं बढ़े, लेकिन हमें अभी बहुत दूर जाना है। परिवार में लड़कियों की शिक्षा में तो बाधाएं अब कम आ रही हैं, लेकिन शिक्षा के बाद उनके करियर और शादी के सवाल पर हमारा रवैया ‘सर्कस’ वाला ही है।

हम लड़कियों पर अब भी शासन करने वाले समाज के रूप में ही पहचाने जा रहे हैं। बच्‍चों, महिलाओं के साथ होने वाले व्‍यवहार पर हमारी प्रतिक्रि‍या इसका सबसे प्रबल प्रमाण है।

बच्‍चे क्‍या पढ़ें, कौन सा रास्‍ता चुनें, यह हमारे समाज का सर्कस से प्रेम दिखाने वाला दूसरा काम है। हम बच्‍चों को पालते तो नेशनल पार्क वाली फीलिंग से हैं, लेकिन हमारा आचरण हमेशा सर्कस वाला होता है। हम बच्‍चों पर इस हद तक नियंत्रण चाहते हैं कि यह कामना हमें मनोरोगी बनने की ओर धकेल रही है।

हम चाहते क्या हैं यह हमें भी ठीक से नहीं पता होता है। बच्‍चों में अपनी कामयाबी की खोज, अपनी हसरत पूरी करने की चाह हमें ऐसी ही सनक की ओर ले जाती है। हम निरंतर ऐसा किए जा रहे हैं, क्‍योंकि हमें ऐसा ही करने की ट्रेनिंग मिली है। ऐसा ही करने के लिए हम प्रशिक्षित किए गए हैं।

आखिर में करियर, नौकरी। यहां भी हमारा व्‍यवहार अपने निर्णय खुद करने की जगह दूसरों के हिसाब से चलने वाला है। हम जब तक बादल देखकर मौसम की चाल समझने की कोशिश नहीं करेंगे, रेनकोट बनाने वाली कंपनियां हमें गर्मियों में भी रेनकोट बेचती रहेगी।

मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है की जो हमारे फैसले लेते है वो हमारे बारे में गलत सोचते हैं, हमारा अहित चाहते हैं। हमें उनकी बातों को बरे ध्यान से सुनना और समछना चाहिए। अौर हमें उसे सलाह के तौर पर लेना चाहिए ना कि आज्ञा के तौर पर।

करियर के मामले में भी सजग और भविष्‍यवादी दृष्टि का विकास होना जरूरी है। सबका सम्‍मान करिए, सबके साथ रहिए, लेकिन हमेशा निर्णय अपना करिए।
अब अपना निर्णय करने का वास्तविक अर्थ यह नही है की आप दूसरों पे विश्वास करना छोर दे, क्योंकि कुछ लोग होते हैं आप के जीवन में जो आप का भला सोचते है परन्तु किसी भी प्रकार से इसका यह मतलब नहीं कि आप अपनी राय, पसंद, समझ का उपयोग करना ही छोड़ दे। क्‍योंकि जीवन एक और सपने अनंत हैं। ‘सर्कस’ में शेर भी रिंग मास्‍टर के हंटर की फटकार पर नाचते हैं। इसलिए, समझिए क‍ि जिंदगी ‘सर्कस’ नहीं है और आप मनुष्‍य हैं ना कि कोई वणप्राणी…


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असफल या फिर सफल ?

मोबाइल, फेसबुक और अखबार उन बच्‍चों से भरे हैं, जिन्‍होंने दसवीं/बारहवीं में शानदार प्रदर्शन किया. बधाई ऐसे बच्‍चों के गले का हार बन गई है. मिसाल के लिए हमेशा घर की खिड़की से बाहर झांकते समाज में बच्‍चों की यह कामयाबी जितना उनका भला नहीं करती उससे कहीं अधिक उनका नुकसान करती है.
सफल बच्‍चा उस बच्‍चे से कैसे बेहतर हो सकता है, जो तय समय में रटी/समझी चीजें ठीक से नहीं लिख पाया.
यह समझ पाना बहुत मुश्किल है कि कैसे एक कम नंबर पाने वाले बच्‍चे को उस बच्‍चे से कमज़ोर कहा जा सकता है, जिसके नंबर उस बच्‍चे से अधिक आए हैं. बात केवल भारत की नहीं है, दुनिया के तमाम बड़े देश इस बात की गवाही देते हैं कि वहां के इतिहास, विज्ञान, शोध, राजनीति, कला, सिनेमा में जितना योगदान कम नंबर लाने वालों का है, उतना दूसरे किसी का नहीं है.
नोबल पाने वालों की सूची इस बात का दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण है कि बच्‍चे केवल स्‍कूल में फेल होते हैं. समस्‍या स्‍कूल की परीक्षा प्रणाली में है, उन बच्‍चों में नहीं, जो वहां कथित रूप से कमज़ोर घोषित किए जाते हैं. यह पोस्‍ट उनके लिए नहीं है, जिनके नंबर बहुत अच्‍छे आए. उनके लिए तो समाज बाहें फैलाए बैठा है. यह उनके लिए है, जिनकी नजरें, कंधे झुके हैं. जो खुद को हारा, टूटा महसूस कर रहे हैं.

मैंने कही किसी मैगज़ीन में कितनी खूबसूरत बात पढ़ी है,

‘CBSE का रिजल्ट आया. कई लोगों ने टॉप किया और बहुत से बच्चों के आशा से कम नंबर आए. जिनके नंबर कम आए, उम्मीद मुझे उन्हीं से है, क्योंकि पिछले 70 साल में टॉपर्स ने देश के लिए क्या किया, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता. हां, टॉपर्स ने अपने लिए बहुत कुछ किया, यह मैं बखूबी जानता हूं. इसलिए जिनके कम नंबर आए, उन्हें बहुत बधाई. देश और समाज को उनसे बहुत आशाएं हैं.’

इस बात को थ्‍योरी मत समझिए. न ही इसे ऐसे देखा जाना चाहिए कि अरे इन बातों से कुछ नहीं होता. जिंदगी की दौड़ बड़ी क्रूर है. जानलेवा प्रतिस्‍पर्धा में बच्‍चा कैसे टिकेगा. असल में ऐसा कहते ही हम मनुष्‍य और मनुष्‍यता दोनों पर संदेह के घोड़े दौड़ा देते हैं. दसवीं और बारहवीं की परीक्षा असल में कोई मील का पत्‍थर नहीं है. यह हमारे पुराने, सड़ गल चुके सिस्‍टम की कमी है कि उसे अब तक बच्‍चों की प्रतिभा को सामने लाने का कोई दूसरा तरीका नहीं मिला है.
इसलिए सरकार, समाज और स्‍कूल अपनी पुरानी हो चुकी सोच को बदल नहीं पा रही हैं. हम दुनिया के उन देशों की ओर नहीं देख रहे हैं, जो आज भी बच्‍चे को सात साल के बाद स्‍कूल भेजने के नियम पर कायम हैं. हम उन अमेरिकन कॉलेजों के बारे में आंख-कान बंद किए हैं, जहां सबसे अधिक समय इस बात पर दिया जाता है कि आपकी रुचि क्‍या है. बेकार की चीजों में समय मत लगाइए, खुद को समझिए.
अंग्रेजों को कितना ही कोसते रहिए कि वह आपको क्‍लर्क बना गए. लेकिन उनको गए तो जमाना बीत गया. पीढ़ियां आईं और चली गईं, लेकिन स्‍कूल वैसे ही रहे. शिक्षा की रेल उसी पटरी पर दौड़ी जो अंग्रेज बिछा गए थे. हमने अपने टैगोर की विश्‍व भारती वाला रास्‍ता नहीं चुना. हमने शिक्षा के बारे में गांधी, बुद्ध और आइंस्‍टाइन की बातें नहीं सुनी. हम बच्‍चों को ढांचा बनाने में लग गए.
आप गमलों में पौधे उगाकर पर्यावरण को नहीं बचा सकते. उसके लिए जंगल चाहिए. ठीक इसी तरह नई, वैज्ञानिक सोच-समझ वाले नजरिए वाला देश बड़ों से नहीं बनेगा. उसका बीज बच्‍चों से तैयार होगा. इसलिए बच्‍चों को मार्कशीट के आधार पर तौलना बंद करना होगा. यह अपने ही खिलाफ किया जा रहा सबसे बड़ा अपराध है.
इसलिए, अपने उन बच्‍चों को जो आज नंबर की होड़ में पिछड़कर आत्‍महत्‍या तक को निकल रहे हैं, संभालिए. समझाइए कि स्‍कूल दुनिया से मिलने का रास्‍ता तो दूर, पगडंडी तक नहीं हैं. हमेशा याद रखिए और दूसरों से साझा करिए,

बच्‍चा असफल नहीं होता, असफल स्‍कूल होता है. बच्‍चे हमेशा मंजिल तक पहुंचते हैं, बशर्ते हम उनको बता सकें कि जाना कहां है.’

और यह हमारा और हमारे समाज का ही काम है, बच्‍चों का नहीं.

Image Source : Internet

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