सच्चाई

आज फिर मैंने उसे पिटते देखा था,
मदद की उम्मीद में नजरों को दौड़ाते देखा था,
दर्द से डूबी आवाज को कड़ाहते देखा था,
पंद्रह- बीस हट्टे – कठ्ठे नौजवानों को लाचार सा दर्शक बनते देखा था,
किसी बलशाली को अपना बाहुबल किसी लाचार पर बरसाते देखा था,
और उसी सड़क के किनारे से उस पल मैं भी गुजर रहा था,
सोचा भी था कि जाके उसकी मदद करू,
जा के पुछू् कि क्यूं मार रहे हो भाई….. आखिर इसकी ग़लती क्या है?
गलती कुछ भी हो पर इसे इस पीड़ा से जरूर बचाऊंगा,
ऐसा ही मैंने सोचा था,
उन काफिड़ो कि भीड़ में हीरो बनने का सुनहरा मौका था,
एक सुंदर सी कहानी का जादूई पात्र बनने का मौका था,
जिसकी कहानी में सब बच्चों को सुनाता,
पर न जाने क्यों मेरे पैर ने मानो मेरे सोच से बैर कर लिया हो,
दिल चिल्ला रहा था मदद करो,
पर दिमाग ने बोला तेरा क्या जाता है आगे बढ़ो,
एक बार फिर दिल और दिमाग की लड़ाई में दिल हार गया,
उसे यूं ही पिटते उसकी हालत पर छोड़ मैं आगे बढ़ आया,
दिल से एक आवाज आयी – भाई उन काफिड़ो कि फौज में स्वागत है तुम्हारा,
इसे सुनते ही फिर पूछा दिमाग से – कही मेरे मदद की ही तो जरूरत नहीं थी उसे?
और जवाब आया – कोई और मदद कर देगा,
तेरा कौन है भाई?
इतने देर में मैं तो उसे उसकी हालत पर छोड़ आगे बढ़ गया था,
और इसी तरह मैंने आज उसे फिर पिटते देखा।


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imkeshavsawarn |Manish Kumar

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