जरिया किताबो का 

ढूंड तो में तुम्हे रहा था, बस जरिया कितबो का था।।   हम तो सोशल मीडिया इस्तेमाल किया करते थे, पर आज बैठ कर यादे लिखे जा रहे है।। जब मालूम ही था की तुम आखरी पन्ने में हो, फिर भी हर पन्ना किसी उम्मीद में बदले जा रहे थे।। में ने तो किताब कीContinue reading “जरिया किताबो का “

वक्त को वक्त भी नहीं

वक्त को वक्त भी नहीं, फिर भी नज़रें तुम्हें ही तलाशती है… ये सोचना ग़लत है_ कि तुम पर नज़र नहीं है। मसरूफ़ हम बहुत है मगर बे-ख़बर नहीं है ।। बत्तमीज़ तुम इसलिए नही हुई क्योंकि किसी और पे सवाल हुआ सवाल वो तुम सह न सकी जो तुम पे बार बार हुआ।। तुमContinue reading “वक्त को वक्त भी नहीं”

दलील

युद्ध स्तर पर हमने तुम से बात की थी, पर तुम तोे नेताओं की तरह मुकर गये।  हम ने तुमसे एक snifter की गिलास क्या मांगा? तुमने हमे नसेरी बना दिया। हम उस काले घने आशमा की तरह थे, पर तुम तो हवा बनके उस पे भी अपना अधिकार कर बैठी।  आरजू तो बस इतनीContinue reading “दलील”