जरिया किताबो का 

ढूंड तो में तुम्हे रहा था,
बस जरिया कितबो का था।।

 
हम तो सोशल मीडिया इस्तेमाल किया करते थे,
पर आज बैठ कर यादे लिखे जा रहे है।।

जब मालूम ही था की तुम आखरी पन्ने में हो,
फिर भी हर पन्ना किसी उम्मीद में बदले जा रहे थे।।

में ने तो किताब की कवर को ही देख किताब पढ़ डाली,
पर तुम तो सच में अनपढ़ बनकर किताब को कबार समझ रद्दी में बेच डाली।।

मालूम है की में वो नहीं हूँ जिसे तुम चाहती हो,
हम तो वो रकीब है जो महफिलो में घर धुन्ध्ते है।।

हम तो हमेशा तुम्हे देख के ही नशे में रहा करते थे,
पर कमबख्त आज पूरी बोतल पि ली फिर भी होश में है।।

This poem, ‘जरिया कितबो का’ is under copyright of LoOsEaCtIoN.
&_Keshav Sawarn| ©2017LoOsEaCtIoN

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    Published by Keshav Sawarn

    I'm not perfect bcz im not fake....

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